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Vidhayak.com > News & Views > पत्रकारिता पर हमला, लोकतंत्र के शेष तीनों स्तंभो के लिए सवालिया निशान है
News & Views

पत्रकारिता पर हमला, लोकतंत्र के शेष तीनों स्तंभो के लिए सवालिया निशान है

Praveen Jakhar
Last updated: 2025/10/18 at 10:29 PM
By Praveen Jakhar
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8 Min Read
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जयपुर। पावर दिखाकर पत्रकारों को डराना, धमकाना, पुलिस के जरिए उठा लेना और प्रताड़ित करना आजकल सत्ता के गलियारों में शगल बनकर उभर रहा है। हाल ही द सूत्र के प्रधान संपादक आनंद पांडे और प्रबंध संपादक हरीश दिवेकर को बिना आरोप और एफआईआर दर्ज किए उठा लिया गया। इस घटना से पत्रकारिता जगत में हलचल मच गई। वजह थी बीते महीनेभर से द सूत्र के वेब पोर्टल और यूट्यूब चैनल पर पत्रकारों ने राजस्थान की उप मुख्यमंत्री दीया कुमारी के खिलाफ मुद्दों को उजागर किया था। दीपावली के ठीक पहले दोनों वरिष्ठ पत्रकारों को राजस्थान पुलिस द्वारा मध्य प्रदेश से उठाना और राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल का पूरे मामले से अनभिज्ञता दर्शाना पूरे सिस्टम के खोखले होने का इशारा करता है।

नेता चाहते हैं नो नेगेटिव न्यूज, ब्लैकमेलिंग के लगाते हैंं आरोप

पॉलिटिकल लॉबी में बीते कुछ सालों में नेगेटिव न्यूज का खौफ इस कदर है कि नेता नेगेटिव न्यूज बर्दाश्त ही नहीं कर पाते। जब कुछ बेबाक पत्रकार उनके करप्शन और घोटालों को जनता के सामने लाने का साहस करते हैं, तो उनके खिलाफ पुलिस का सहारा लेकर जोर-आजमाइश की जाती है। उन्हें प्रताड़ित करने का प्रयास किया जाता है। सबसे सरल हथियार है ब्लैकमेलिंग का आरोप जड़ दो और पत्रकार को छोड़ दो, अपनी सफाई पेश करने के लिए। यह सही है कि कुछ पत्रकार निज स्वार्थों में या पॉलिटिकल प्रभावना में अपने जमीर से समझौते कर रहे हैं, लेकिन इसका यह मतलब निकालना की पूरा मीडिया का सिस्टम भ्रष्ट हो चुका है बिलकुल गलत है। लेकिन नेताओं और पुलिसकर्मियों को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि वह भी दूध के धुले नहीं हैं। अगर सभी पत्रकार उनके मामले उजागर करने पर उतारू हो जाएं, तो भ्रष्ट नेताओं और भ्रष्ट पुलिसकर्मियों को मुंह छिपाने की जगह तलाशनी मुश्किल हो जाएगी।

दुर्गसिंह राजपुरोहित, रामगोपाल जाट, अब आनंद पांडे और हरीश दिवेकर

राजस्थान की पत्रकारिता में पत्रकारों को पुलिस के जरिए उठा लेने और फिर प्रताड़ित करने के प्रयास नए नहीं है। बाड़मेर के चर्चित युवा पत्रकार दुर्गसिंह राजपुरोहित को तत्कालीन बिहार के राज्यपाल सतपाल मलिक के इशारे पर उठा लिया गया। बाड़मेर एसपी ने राजपुहित को चाय पीने बुलाया और बिहार पुलिस के हवाले कर दिया। एक लम्बी जद्दोजहद और चंद पत्रकारों द्वारा राजस्थान में इस मुद्दे को उठाने के बाद राजपुरोहित को छोड़ा गया। लेकिन बाड़मेर से बिहार की सेंट्रल जेल तक राजनीतिक रसूख दिखाने और प्रताड़ित करने के प्रयासों के तहत अनुचित कार्रवाई की गई

इसी वर्ष फरवरी में युवा पत्रकार राम गोपाल जाट को अलसुबह 15-16 पुलिसकर्मियों ने उनके घर से डिटेन कर लिया। परिवारवालों और पत्रकारों को खबर तक नहीं लगी कि पुलिस कहां लेकर गई। प्रताड़ित करने और दबाव बनाने के लिए लोकेशन बदले गए और लिए जेल भेज दिया गया। राम गोपाल जाट कुछ दिन जेल रहे लेकिन वापसी के बाद भी अपने संघर्षों के साथ बने हुए हैं। जाट ने भी उप मुख्यमंत्री दीया कुमारी के खिलाफ खबरें चलाई थी, जिसके बाद उन पर कार्रवाई की गई।

अब ताजा मामले में द सूत्र के दो वरिष्ठ पत्रकारों को उठाकर खबरों की ब्लैमेलिंग का मामला दर्ज किया गया। इनमें द सूत्र के प्रधान संपादक आनंद पांडे और प्रबंध संपादक हरीश दिवेकर की मजबूत टीम ने राजस्थान में उप मुख्यमंत्री दीया कुमारी के खिलाफ एक के बाद एक कई खबरें बीते महीनेभर में चलाई। जब मामला उलझता दिखा, तो दोनों वरिष्ठ पत्रकारों को राजस्थान पुलिस मध्य प्रदेश से उठा लाई, बाकायदा जयपुर पुलिस ने प्रेस नोट जारी किया जैसे कोई गंभीर अपराध इन दोनों पत्रकारों द्वारा किया गया हो। यह मसला कोर्ट कचहरी और मानहानी से जुड़ा हो सकता था, लेकिन इसे दीपावली के ठीक पहले इस तरह रचा गया कि पत्रकारों के साथ अपराधियों जैसा बर्ताव किया गया। बहरहाल 24 घंटे में ही दोनों पत्रकारों को पुलिस को छोड़ना पड़ा।

मीडिया को कमजोर करना, लोकतंत्र का कजोर होना है

लोकतंत्र के चारों स्तंभों में राष्ट्रहित में सेवार्थ जुटे सभी भागीदारों को देखा जाए, मीडिया इस समय सबसे बडेÞ संकट से गुजर रहा है। मीडिया संस्थान खर्चों से टूटकर कॉलेप्स कर रहे हैं। पत्रकारों के सामने रोजी-रोटी का संकट है। बढ़ती महंगाई में पत्रकारों की आमदनी की सुनिश्चिता करने वाला काई नहीं है। मीडिया संस्थानों में कार्यरत टॉप 3-5 प्रतिशत पत्रकारों को छोड़ दें, तो बाकी संघर्ष ही कर रहे हैं। लेकिन लोकतंत्र के बाकी के तीनों स्तंभों से जुडेÞ किसी भी व्यक्ति, संस्था को देखा जाए, तो पावर और पैसे में कही पीछे नहीं हैं। साथ ही बाकी के तीनों स्तंभ मौके-बेमौके मीडिया को कमजोर साबित करने में जुटे हुए हैं। इससे होना क्या है? मीडिया जितना कमजोर होगा, शेष तीनों स्तंभ उतने ही खोखले होते चले जाएंगे।

राजस्थान में हर 10 हजार पर एक पत्रकार, जनता की आवाज उठाएगा कौन?

वरिष्ठ पत्रकार अशोक शर्मा के मुताबिक राजस्थान में तकरीबन 8000 छोटे-बडे पत्रकार हैं। कुल आबादी में पत्रकारों की सेवाओं और जनता के लिए मुद्दे उठाने वालों को बांटा जाए, तो करीब-करीब हर दस हजार लोगों पर एक पत्रकार मौजूद है। ऐसे में मीडिया या मीडियाकर्मियों को शिकार बनाना मतलब सीधे तौर पर लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करना ही है।

पत्रकारों को करप्ट बताना आसान, उनकी तरह संघर्ष करना मुश्किल

आज किसी ब्यूरोक्रेट, नेता, सरकारी इंजीनियर, अफसर, प्रोफेसर किसी भी पूछें अपने बच्चों को क्या बनाएंगे? कोई आईएएस, आईपीएस बनाने की बात करकेगा, कोई अफसर, कोई कॉर्पोरेट में भेजने की बात करेगा, तो काई डॉक्टर या इंजीनियर बनाने की बात करेगा। लेकिन शायह ही कोई आपको मिले, जो कहेगा की मैं मेरे बच्चे को मीडिया में भेजना चाहंूगा। यहां तक की मीडियाकर्मी भी ऐसा सोचने से घबराते हैं। क्योंकि भयंकर असुरक्षा का माहौल, आर्थिक संकटों का सामना, प्रशासनिक और पॉलिटिकल दबावों की राजनीति, ब्लैकमेलिंग के ठप्पे लगाने के बेतुके प्रयास और तमाम तरह की समस्याओं से जुझने की ताकत हर रोज पैदा करना आसान नहीं होता।

ऐसे बहुत से लोग आज देखने को मिल जाएंगे जो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर पत्रकारों को गालियां देते, आलोचना करते, ब्लैमेलर बताते नजर आएंगे। लेकिन वह उन संघर्षों से न कभी दो चार हुए हैं, न उनके बस की बात है ऐसे संघर्षों के बीच अपनी पर्सनल लाइफ को दांव पर लगाते हुए दुनिया के लिए दिन रात खबरें जुटाने का साहस वो कर पाए। पत्रकारिता एक दुधारी तलवार की तरह है, जिस पर चलने वाले अपने घावों के साथ मुस्कुराते, साहस दिखाते, संघर्षों का सामना करते केवल यह प्रयास करते हैं कि कोई खबर ब्रेक कर पाएं। उस खबर से उन पत्रकारों का घर नहीं भरता, बल्कि निजी दुश्मन बनने के साथ सिस्टम में लोग उनके खिलाफ हो जाते हैं। जिसका खामियाजा मीडिया संस्थान कम, पत्रकार ज्यादा उठाते हैं।

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