मुंबई। महाराष्ट्र की राजनीति देश में सबसे ज्यादा उथल-पुथल मचाते हुए देखी जाती है। यहां ऐसी अप्रत्याशित राजनीतिक घटनाक्रम हर दो-चार महीने में देखने को मिलते हैं, जो स्थानीय राजनीतिक समीकरण पलट कर रख देते हैं। आज एक बार भी यही हुआ। राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे एक साथ सड़क पर उतरे। विराट गर्जना मार्च के नाम पर दोनों भाई एक होकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और शिवसेना (यूबीटी) को एकजुट कर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सड़कों पर उतर गए।
यह विरोध प्रदर्शन मुंबई के प्रसिद्ध मेट्रो सिनेमा जंक्शन से शुरू होकर महानगरपालिका (BMC) भवन और आजाद मैदान की तरफ बढ़ा। इस मार्च की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि इसमें किसी भी राजनीतिक दल के झंडे की अनुमति नहीं थी, सभी प्रदर्शनकारी और खुद दोनों नेता हाथों में सिर्फ तिरंगा थामे हुए आगे बढ़ रहे थे।
SIR प्रक्रिया को रद्द करने की मांग
राज ठाकरे ने सीधे तौर पर महाराष्ट्र में चल रही SIR प्रक्रिया को तत्काल प्रभाव से रद्द करने की मांग उठाई है। उनका आरोप है कि इस पुनरीक्षण के नाम पर बड़े पैमाने पर गड़बड़ियां की जा रही हैं और देश भर में करीब 13 करोड़ वैध मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाकर उन्हें मताधिकार से वंचित किया जा रहा है। राज ठाकरे ने रैली को संबोधित करते हुए एक बार फिर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) पर सवाल उठाए और मांग की कि देश में आगामी सभी चुनाव मतपत्रों के जरिए कराए जाएं।
ज्ञानेश कुमार भाजपा का हथियार हैं – उद्धव ठाकरे
रैली के समापन पर जनसभा को संबोधित करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे केंद्र सरकार और चुनाव आयोग पर बेहद हमलावर नजर आए। उन्होंने तीखा तंज कसते हुए कहा, “ज्ञानेश कुमार स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर रहे, बल्कि वे पूरी तरह से भाजपा के हथियार के रूप में काम कर रहे हैं।”
उद्धव ठाकरे ने CEC की नियुक्ति प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि चुनाव आयुक्तों की चयन समिति से कानून बनाकर भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को हटाना लोकतंत्र का गला घोंटने जैसा था। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा, “आप संवैधानिक संस्थाओं को तो अपने नियंत्रण में कर सकते हैं, लेकिन देश की सड़कें आज भी हमारी हैं. अगर ‘मेक इन इंडिया’ के तहत देश में तानाशाह बनाने की कोशिश होगी, तो जनता उस तानाशाही को दफन करना जानती है।”
ठाकरे बंधुओं के इस मार्च को महाराष्ट्र के पूरे विपक्ष का मजबूत साथ मिला. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता बालासाहेब थोरात और एनसीपी (शरद पवार) के नेताओं ने भी इस प्रदर्शन में हिस्सा लिया। थोरात ने राहुल गांधी के “वोट चोरी” के आरोपों का हवाला देते हुए कहा कि साल 2014 के बाद से देश में लोकतंत्र और संविधान को खतरे में डाल दिया गया है। शिवसेना (UBT) नेता संजय राउत ने भी इस मोर्चे की तुलना ‘1857 के विद्रोह’ से करते हुए कहा कि यह देश में चल रही तानाशाही और चुनाव हाईजैक करने की नीति के खिलाफ जनता का खुला विद्रोह है।


